11 जुलाई 2014

कार्यशाला-३५ शहर में बरसात



शहर में बरसात आ गई है, और इस बरसात से खुश-हैरान-परेशान जन अपनी अपनी जीवन गाथा को अलग अलग तरह से व्यक्त करने लग गए हैं। अपने शहर की बरसात को रेखांकित करने का यह विशेष अवसर है जब सभी रचनाकार इस कार्यशाला में अपने उस विशेष शहर की बरसात को नवगीत में बाँध सकते हैं जहाँ वे रहते हैं। जो लोग शहर में नहीं रहते गाँव में रहते हैं वे अपने गाँव की बारिश के विषय में नवगीत लिख सकते हैं। नवगीत भेजने की अंतिम तिथि है १५ जुलाई २०१४, पता है- navgeetkipthshala@gmail.com

6 जुलाई 2014

२५. याद मुझे फिर कनहल आया

तपती देख धरा की काया।
याद मुझे फिर कनहल आया।

प्यारा था वो गाँव सलोना।
भाता था फूलों का होना।
घर के सम्मुख गुलबगिया में,
था कनेर का भी इक कोना।
जिसके बहुरंगी फूलों ने,
सदा प्रकृति से प्रेम सिखाया।

भरे ग्रीष्म में छैल छबीले।
श्वेत, लाल, केसरिया, पीले।
बंजारे, बस जाते थे ये,
पुनः पेड़ पर बना कबीले।
इन अपनों से खेल खेल में,
झोली भर अपनापन पाया।

नानी थी जब कथा सुनाती।
विधि विधान के सूत्र सिखाती।
गंध हवा में इन फूलों की,
घुलकर मृदु लोरी बन जाती।
ख्वाबों में तब जुगनू बनकर,
इन मित्रों ने था बहलाया।

लगे आज कुदरत पर ताले।
पृष्ठ हुए कर्मों के काले।
वृहद वृक्ष लाकर गमलों में,
ठूँस रहे हैं शहरों वाले।
चुपके से ये कीट कर रहे,
घनी छाँव का क्रूर सफाया।

-कल्पना रामानी
मुंबई

२४. फूल कनेर के

किसने रोके पाँव अचानक
धीरे-धीरे टेर के।
उजले-पीले भर आए
आँगन में फूल
कनेर के।

दिन भर गुमसुम सोई माधवी
तनिक नहीं आभास रहा
घिरा अँधेरा खूब नहाई
सुगन्ध- सरोवर पास रहा।

पलक बिछाए बिछे धरा पर
प्यारे फूल
कनेर के।

मन बौराया चैन न पाए
व्याकुल झुकती डाल-सा
पीपल के पत्ते सा थिरके
हिलता किसी रूमाल-सा।

चोर पुजारी तोड़ ले गया
प्रातः फूल
कनेर के

- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
नई दिल्ली