03 December 2009

कार्यशाला-६ कोहरा या कुहासा

नवगीतों की पाँचवीं कार्यशाला धीरे धीरे आगे बढ़ी फिर भी इसमें अच्छे नवगीत आए और नए लोगों की रचनाएँ देखकर ऐसा लगा कि उनमें नवगीत की समझ बढ़ रही है। सभी भाग लेने वालों को बहुत बहुत धन्यवाद। अभी कार्यशाला-4 और 5 पर विशेषज्ञों की टिप्पणी आना बाकी है लेकिन उसके पहले अच्छा यह है कि अगली कार्यशाला के विषय की घोषणा कर दी जाए। क्या ही अच्छा हो अगर सब अगली कार्यशाला में मौसम का ध्यान रखते हुए कोहरा या कुहासा को विषय बनाएँ। दोनों में से किसी भी एक शब्द का रचना में आना आवश्यक है। यह ज़रूरी नहीं कि यह शब्द मुखड़े में ही हो लेकिन पूरा गीत सर्दी के मौसम का आभास करानेवाला ज़रूर होना चाहिए। नवगीत के लिए आवश्यक है कि नए बिम्ब, नया छंद और जन सामान्य से जड़ा विषय रचना में लिया जाए।

यहाँ एक चैट बॉक्स लगाया है विचार विनिमय के लिए। नीचे दाहिनी ओर यह संकेत मिलता है कि कितने लोग ऑनलाइन हैं। उसको ध्यान में रखकर बात की जा सकती है।

कार्यशाला-5 से अनुभूति के आगामी अंक में किसी रचना को नहीं लिया जा रहा है। क्यों कि दीपावली के विषय पर लिखी गई रचनाओं को इस समय प्रकाशित करना उचित नहीं रहेगा। लेकिन इस कार्यशाला की चुनी गई रचनाओं को हम अनुभूति के अगले दीपावली विशेषांक में शामिल करेंगे। जब तक कार्यशाला-4 और 5 पर हमारे विशेषज्ञों की राय आती है, तब तक हम नये गीत लिखना जारी रखते हैं। कार्यशाला-6 के लिए रचनाएँ भेजने की अंतिम तिथि 30 दिसंबर 2009 है।
नयी कार्यशाला की अनेक शुभकामनाओं के साथ -पूर्णिमा वर्मन

30 November 2009

२०- इस बार दिवाली पर

इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

दिया जलेगा या बाती या तेल जलेगा
या मेरा दिल कोने में चुपचाप जलेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

रंगोली जब मेरे आँगन सज जाएगी
लक्ष्मी मेरे द्वारे आ कर रुक जाएगी
मैं तो हूँ परदेस में टीका कौन करेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

खुशियाँ तो आएगी मेरे दरवाज़े भी
गूँजेंगे घर में मेरे गाजेबाजे भी
पर मेरे घर गणपति पूजन कौन करेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

बैठी होगी कहीं ढूँढ़ करके वो कोना
उसका दिल होगा जाने कितना सूना
देश में उसकी रीति गागर कौन भरेगा
इस बार दिवाली पर ना जाने कौन जलेगा

-दिगंबर नास्वा

१९-अँधियारा हँसता है

दीप जलाते रहे अनगिनत
फिर क्यों अँधियारा हँसता है

माटी के सोने-चाँदी के
दीपों में घृत-तेल भरा था
और वर्तिका डुबो उसी में
अग्नि पुंज स्पर्श धरा था
किंतु भुला बैठे थे हम यह
दीपक तले तिमिर बसता है।


दीप जलाए थे जो भी सब
केवल तन की अभिलाषा थी
दीप शिखा में नहीं कहीं भी
दीपित मन की सद-आशा थी
इसीलिए दिन-रात जगत पर
अंधकार पंजा कसता है।


दीप और अँधियार लड़े जब
अँधकार ने यह पहचाना
दीप जलाकर भस्म करेगा
मुश्किल है मेरा बच पाना
दीपक की छाया बन बैठा
मान दीप का ही ग्रसता है।

-निशेष जार

१८-एक दीपक

जूझ कर कठिनाइयों से
कर सुलह परछाइयों से
एक दीपक रातभर जलता रहा

लाख बारिश आँधियों ने सत्य तोड़े
वक्त ने कितने दिए पटके झिंझोड़े
रौशनी की आस पर
टूटी नहीं
आस्था की डोर भी
छूटी नहीं

आत्मा में डूब कर के
चेतना अभिभूत कर के
साधना के मंत्र को जपता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा

जगमगाहट ने बुलाया पर न बोला
झूठ से उसने कोई भी सच न तौला
वह सितारे देख कर
खोया नहीं
दूसरों के भाग्य पर
रोया नहीं

दिन महीने साल निर्मम
कर सतत अपना परिश्रम
विजय के इतिहास को रचता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा

--पूर्णिमा वर्मन

१७-अब न जाने खील-सा

अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

गाँव का वह नीम टेढ़ा
याद आता है
पेड़ पीपल का अभी भी
छटपटाता है
बाग में चलते रहँट का
स्वर अनोखा-सा
खो गया जाने कहाँ
पर झनझनाता है।
रोशनी की फिर नुमायश
हो रही घर द्वार सबके

पर न जाने क्यों नहीं मन से गई भटकन।
अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

माँ बताशा खील दीपक
घर सभी के भेजती थी
वह अमिट दौलत
अभी तक खर्च करता आ रहा हूँ
रोशनी तो कैद कर ली है
हक़ीक़त है मगर यह
इस शहर की भीड़ में
अब तक सदा तनहा रहा हूँ।
ज्योति का यह पर्व
मन को गुदगुदा पाता नहीं है

प्रश्न रह रह उठ रहा है कौन-सा कारन!
अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

हम समय की बाँह थामे
चल रहे बस चल रहे हैं
ठीकरों की होड़ में हम
मनुजता को छल रहे हैं
भेड़ियों की भीड़
बस्ती में पनपती जा रही फिर
संदली वन आस्थाओं के
निरंतर जल रहे हैं।
है समय का फेर
या अँधेर चाहे जो समझ लो

नाश होता है हमेशा वक्त का रावन!
अब न जाने खील-सा खिलता नहीं क्यों मन!

-डॉ. जगदीश व्योम

१६- यादें तेरी भर आँचल में

यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है|

विरह-व्यथा में भिगो-डुबो कर, वर्ष भर रखी मन की बाती,
यादों की माचिस से जल, फिर भभक उठी है मेरी छाती,
पीड़ा का तूफान समेटे रात अँधेरी घिर आई है,
यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है,

थीं मुस्काती फुलझड़ियों सी, घर में फिरती थी चरखी सी,
तेरी पायल की छुन-रुन-झुन, लगती थी मीठी गुझिया सी,
जब गुस्सा करती तो लगता तू ऐटम-बम की भी माई है,
यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है|

फीकी लगती है ये गुझिया, घर-आँगन-देहरी रोते सब,
दीप मुझे आँखों में चुभते, झालर साँपों सी डँसती अब,
चीख पड़ा है देखो रॉकेट, छुरछुरिया भी चिल्लाई है,
यादें तेरी भर आँचल में, ये दीवाली फिर आई है|

--धर्मेन्द्र सिंह सज्जन

१५-फिर दिवाली आई है

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है

न हो छल विषाद मनों में अब
द्वेष हटा प्रेम में हों लीन सब
बुराई का विनाश कर अच्छाई छाई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

तिमिर मार रोशन हो जग अब
सब के मन से मिटे कालिमा अब
रावण मार रामजी ने कैसी लीला रचाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

उजला हो मन सब का अब
दीप जला जागो इन्सान अब
सौहार्द औ प्रेम की छटा चहुँ ओर छाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

--अरविन्द चौहान